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हो गई है पीर पर्वत – दुष्यंत कुमार कविता | Dushyant Kumar Poem

हो गई है पीर पर्वत / दुष्यंत कुमार कविता हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी… Read More »

अर्जुन की प्रतिज्ञा मैथिलीशरण गुप्त कविता | Maithili Sharan Gupt Poem

अर्जुन की प्रतिज्ञा -मैथिलीशरण गुप्त उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते… Read More »

कुमार विश्वास मुक्तक | Kumar Vishwas Muktak

मुक्तक कुमार विश्वास | Kumar Vishwas Muktak   basti basti ghor udasi parvat parvat khalipan man heera be mol bik gaya ghis ghis rita tan chandan is dharti se us ambar tak buss do hi chiz gazab ki hai ek to tera bhola pan hai ek mera deewana pan बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन… Read More »

तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है – तुम्हें जीने में आसानी बहुत है कुमार विश्वास

तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है तुम्हें जीने में आसानी बहुत है तुम्हारे ख़ून में पानी बहुत है ज़हर-सूली ने गाली-गोलियों ने हमारी जात पहचानी बहुत है कबूतर इश्क का उतरे तो कैसे तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है इरादा कर लिया गर ख़ुदकुशी का तो खुद की आखँ… Read More »